कितना वक़्त ज़ाया कर दिया मैंने…

कितना वक़्त ज़ाया कर दिया मैंने,
बस रूठे रहने के लिए।

ऐसे लोगों से रूठा रहा
जिन्हें मेरे मनाने की ज़रूरत ही नहीं थी,
और उनसे भी
जिन्हें एक आवाज़,
एक आधी सी मुस्कान
वापस ला सकती थी।

मैं अपने सही होने की ज़िद में
इतना उलझा रहा
कि ये देख ही नहीं पाया
कि वक़्त
किसी की सफ़ाई नहीं सुनता,
बस आगे बढ़ जाता है।

कुछ नाराज़गियाँ
इतनी छोटी थीं
कि आज याद करता हूँ
तो हैरानी होती है—
इनके लिए
हमने कितने त्यौहार,
कितनी शामें,
कितनी बातें कुर्बान कर दीं।

अब समझ आता है
रूठना अक्सर
दूसरे को सज़ा देना नहीं होता,
खुद को
अकेले छोड़ देना होता है।

काश थोड़ा पहले जान लिया होता
कि हर बात जीतने लायक नहीं होती,
और हर इंसान
हमेशा के लिए नहीं रुकता।

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यहाँ भी…

One Comment

  1. “हर बात जीतने लायक नहीं होती”
    पर रूठना और मनाना हार जीत से परे हैं और आवश्यक है
    सुंदर रचना

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