मैं अब हिंदी में बहुत कम लिखता हूँ। यह वाक्य लिखते हुए भी थोड़ा अजीब लगता है, जैसे किसी अपने के बारे में कुछ स्वीकार कर रहा हूँ। कभी ऐसा नहीं था कि मुझे हिंदी से दूरी बनानी पड़ी हो या मैंने जानबूझकर उसे छोड़ने का फैसला किया हो। बस धीरे-धीरे ऐसा हुआ। बिना शोर के, बिना किसी बड़े कारण के।
इन दिनों ज़्यादातर लिखना अंग्रेज़ी में हो रहा है। मेरा तकनीकी ब्लॉग है, काम की भाषा वही है, पाठक भी वहीं हैं। वहाँ लिखना ज़रूरी है, उपयोगी है, और शायद सही भी। चीज़ें साफ़-सुथरी रहती हैं—विचार, तर्क, समाधान। वहाँ लिखते हुए मैं ज़्यादा व्यवस्थित रहता हूँ, ज़्यादा समझदार, ज़्यादा व्यावहारिक। सब कुछ ठीक-ठाक लगता है।
लेकिन हिंदी का मामला अलग था।
हिंदी में लिखना कभी “काम” नहीं रहा। वह एक आदत नहीं थी, एक ज़रूरत थी। हिंदी में मैं वो सब लिख देता था जो किसी और भाषा में कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। वहाँ शब्द मेरे नियंत्रण में नहीं होते थे; मैं शब्दों के भीतर चला जाता था। शायद इसीलिए हिंदी मेरे लिए किसी भाषा से ज़्यादा एक इंसान जैसी हो गई थी—जिससे बिना तैयारी के, बिना सजावट के बात हो जाती थी।
और सच यह है कि हिंदी का मतलब बस तुम थी।
जब तक तुम पढ़ती रहीं, तब तक लिखना स्वाभाविक था। यह कभी सवाल ही नहीं बना कि “किसके लिए लिख रहा हूँ?” लिखना अपने आप में पर्याप्त था। अब जब तुम नहीं पढ़तीं, तो यह सवाल हर बार उभर आता है। और यह सवाल बहुत बुनियादी है। हम चाहे जितना इनकार करें, लिखना हमेशा किसी एक चेहरे को ध्यान में रखकर ही होता है—भले वह चेहरा धीरे-धीरे धुंधला क्यों न हो जाए।
अब जब हिंदी में लिखता नहीं हूँ, तो खालीपन महसूस होता है। लेकिन यह खालीपन शोर नहीं करता। यह बस चुपचाप बैठा रहता है। जैसे कमरे में सब कुछ अपनी जगह पर हो, पर खिड़की बंद हो और हवा रुक गई हो। ज़िंदगी चल रही है, काम हो रहा है, दिन पूरे हो रहे हैं—पर भीतर कहीं कुछ ठहरा हुआ है।
अंग्रेज़ी में लिखते हुए मैं सुरक्षित रहता हूँ। वहाँ भावनाएँ नियंत्रित रहती हैं, शब्द सीमित रहते हैं। वहाँ मैं खुद को ज़्यादा उजागर नहीं करता। हिंदी में ऐसा नहीं था। हिंदी में मेरी थकान दिखती थी, मेरी बेचैनी, मेरे अधूरे सवाल, मेरी बेवजह की उदासी। शायद इसलिए हिंदी से दूरी आसान नहीं थी, पर ज़रूरी हो गई।
कभी-कभी लगता है कि हिंदी छोड़ने से ज़िंदगी थोड़ी सरल हो गई है। कम आत्मसंघर्ष, कम भावनात्मक उलझन। पर उसी के साथ यह एहसास भी रहता है कि कुछ बहुत अपना पीछे छूट गया है—ऐसा कुछ, जिसे शब्दों में ठीक-ठीक समझाया नहीं जा सकता।
अब शायद यही ज़िंदगी का सच है। हर वो चीज़ जो हमारे सबसे क़रीब होती है, हमेशा हमारे साथ नहीं रहती। कुछ रिश्ते समय के साथ बदल जाते हैं, कुछ बिना झगड़े के खत्म हो जाते हैं। और हर दूरी का मतलब नाराज़गी नहीं होता—कभी-कभी बस हालात ही काफी होते हैं।
मुझे नहीं पता हिंदी फिर लौटेगी या नहीं। शायद किसी दिन, बिना चेतावनी के, फिर से लिखना शुरू कर दूँ। या शायद नहीं। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि मैंने हिंदी को छोड़ा नहीं है। बस फिलहाल उससे बात नहीं कर पा रहा हूँ।
और शायद कभी-कभी किसी भाषा से चुप रहना भी, उससे किया गया सबसे ईमानदार संवाद होता है।
